ट्रेड निवेश कंपनियों के प्रमोटरों के लिए शेयर गिरवी रखकर बाजार से पैसा जुटाना मुश्किल हो सकता है. 1 अक्टूबर से डिमैट शेयरों के ट्रांसफर पर लागू होने वाले नए नियमों के चलते ऐसा हो सकता है. इसके तहत NBFCs कंपनी के प्रमोटरों को गिरवी रखी गई पूरी हिस्सेदारी ट्रांसफर करने के लिए नहीं कह पाएंगी.
ऐसे में प्रमोटर, खासतौर पर छोटी कंपनियों के प्रमोटरों के हाथ बंध सकते हैं. अमूमन NBFCs उन्हें शेयर ट्रांसफर करने पर जोर देती है. हालांकि, इसके दूसरे कई रास्ते हैं. मगर NBFCs शेयरों के ट्रांसफर के आधार पर ही कर्ज देना बेहतर समझती है.ट्रेड निवेश
अभी NBFCs प्रमोटर्स के शेयर गिरवी रखने पर उन्हें पैसा उधार देती है. उनके पास शेयर अपने खाते में ट्रांसफर कराने का भी विकल्प होता है. वे कर्ज लेने वाले प्रमोटर के डिमैट खाते की पावर ऑफ एटॉर्नी (PoA) हासिल कर लेती है.ट्रेड निवेश
यदि गिरवी रखे गए सिक्योरिटीज की बिक्री के खिलाफ प्रमोटर कोर्ट चला जाता है, तो कर्जदाता उन शेयरों को बेच नहीं सकता. दोनों प्रमुख डिपोजिटरीज ने सभी NBFCs को ऑफ-मार्केट ट्रांसेक्शन के जरिए ट्रांसफर किए गए शेयरों को 30 सिंतबर 2019 तक वापस करने का आदेश दिया है.
पिछले महीने, CSDL और NSDL, दोनों ही डिपोजिटरीज ने सेबी के निर्देश के बाद कई प्रकार की ऑफ-मार्केट ट्रांजेक्शन पर रोक लगा दी थी. एक बड़ी NBFC के सीईओ ने नाम जाहर नहीं करने की शर्त पर कहा, "सेबी ने कुछ कोड हटाते हुए शेयरों के ट्रांसफर पर रोक लगा दी है."
इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि सेबी का यह कदम शेयरों के ट्रांसफर के बदले कर्ज पर लगाम कसने के लिए है, मगर इसका कोई पुख्ता सबूत नही है. बाजार नियामक या डिपोजिटरी ने आधाकारिक रूप से शेयरों के ट्रांसफर पर लगी रोक का कारण नहीं बताया है.
सेबी का मानना है कि शेयरों के ट्रांसफर या डिमैट खाते की PoA हासिल करने से पारदर्शिता कम होती है, क्योंकि प्लेजिंग छिप जाती है. इसका दुरुयोग होने के आसार अधिक होते हैं.
हालांकि, NBFC के सीईओ के अनुसार शेयरों का ट्रांसफर उचित है, क्योंकि यह कर्जदाता को 100 फीसदी अधिकार देता है. इंडस्ट्री के अधिकारियों के अनुसार, नवंबर 2017 में सेबी ने इसकी शिकायत रिजर्व बैंक से भी की थी. मगर केंद्रीय बैंक ने इस विषय पर कोई खास ध्यान नहीं दिया.

अभी NBFCs प्रमोटर्स के शेयर गिरवी रखने पर उन्हें पैसा उधार देती है. उनके पास शेयर अपने खाते में ट्रांसफर कराने का भी विकल्प होता है. वे कर्ज लेने वाले प्रमोटर के डिमैट खाते की पावर ऑफ एटॉर्नी (PoA) हासिल कर लेती है.ट्रेड निवेश
यदि गिरवी रखे गए सिक्योरिटीज की बिक्री के खिलाफ प्रमोटर कोर्ट चला जाता है, तो कर्जदाता उन शेयरों को बेच नहीं सकता. दोनों प्रमुख डिपोजिटरीज ने सभी NBFCs को ऑफ-मार्केट ट्रांसेक्शन के जरिए ट्रांसफर किए गए शेयरों को 30 सिंतबर 2019 तक वापस करने का आदेश दिया है.
पिछले महीने, CSDL और NSDL, दोनों ही डिपोजिटरीज ने सेबी के निर्देश के बाद कई प्रकार की ऑफ-मार्केट ट्रांजेक्शन पर रोक लगा दी थी. एक बड़ी NBFC के सीईओ ने नाम जाहर नहीं करने की शर्त पर कहा, "सेबी ने कुछ कोड हटाते हुए शेयरों के ट्रांसफर पर रोक लगा दी है."
इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि सेबी का यह कदम शेयरों के ट्रांसफर के बदले कर्ज पर लगाम कसने के लिए है, मगर इसका कोई पुख्ता सबूत नही है. बाजार नियामक या डिपोजिटरी ने आधाकारिक रूप से शेयरों के ट्रांसफर पर लगी रोक का कारण नहीं बताया है.
सेबी का मानना है कि शेयरों के ट्रांसफर या डिमैट खाते की PoA हासिल करने से पारदर्शिता कम होती है, क्योंकि प्लेजिंग छिप जाती है. इसका दुरुयोग होने के आसार अधिक होते हैं.
हालांकि, NBFC के सीईओ के अनुसार शेयरों का ट्रांसफर उचित है, क्योंकि यह कर्जदाता को 100 फीसदी अधिकार देता है. इंडस्ट्री के अधिकारियों के अनुसार, नवंबर 2017 में सेबी ने इसकी शिकायत रिजर्व बैंक से भी की थी. मगर केंद्रीय बैंक ने इस विषय पर कोई खास ध्यान नहीं दिया.
0 Comments